| प्रश्न: भाषा और लिपि का उद्भव एवं विकास पर विस्तारपूर्वक निबंध लिखिए। |
प्रस्तावना
मानव जीवन में भाषा और लिपि का वही स्थान है जो शरीर में आत्मा और आँख का होता है। भाषा के बिना मनुष्य अपनी भावनाओं और विचारों को व्यक्त नहीं कर सकता और लिपि के बिना भाषा को लंबे समय तक सुरक्षित नहीं रखा जा सकता। भाषा हमें एक-दूसरे से जोड़ती है, संवाद का माध्यम बनती है और संस्कृति को आगे बढ़ाती है। वहीं लिपि भाषा को स्थायित्व और पीढ़ी दर पीढ़ी संरक्षित करने की क्षमता देती है। इसलिए भाषा और लिपि दोनों को मानव सभ्यता की नींव कहा जाता है।
भारतीय परंपरा में भाषा को देवी सरस्वती का रूप माना गया है और वेदों में वाणी के महत्व का वर्णन मिलता है। यह स्पष्ट है कि भाषा और लिपि केवल संचार के साधन नहीं, बल्कि समाज, संस्कृति और सभ्यता की आत्मा हैं।
भाषा का उद्भव
भाषा की उत्पत्ति को लेकर विद्वानों में कई मत हैं। कुछ लोग इसे ईश्वर की देन मानते हैं, कुछ इसे प्रकृति की ध्वनियों की नकल बताते हैं और कुछ के अनुसार भाषा समाज की आवश्यकता से विकसित हुई। आदिम मानव ध्वनियों, हावभाव और संकेतों से अपनी बात समझाता था। धीरे-धीरे ये ध्वनियाँ शब्दों में और शब्द वाक्यों में बदल गईं। इस प्रकार भाषा का निर्माण हुआ।
भाषा केवल बोलने का माध्यम नहीं है बल्कि सोचने, समझने और ज्ञान बांटने का भी साधन है। यदि भाषा न होती तो मनुष्य विज्ञान, कला, साहित्य और संस्कृति को विकसित नहीं कर पाता।
भारतीय भाषाओं का विकास
भारत बहुभाषी देश है, लेकिन हिंदी सहित अधिकांश भाषाएँ भारोपीय भाषा परिवार की इंडो-आर्य शाखा से संबंधित हैं। भारतीय भाषाओं का विकास क्रम इस प्रकार है—
पहला चरण वैदिक संस्कृत का था। वैदिक संस्कृत में वेद, ब्राह्मण ग्रंथ और उपनिषद रचे गए। यह भाषा अत्यंत प्राचीन और शुद्ध मानी जाती है। इसके बाद पाणिनि ने अष्टाध्यायी नामक व्याकरण ग्रंथ के द्वारा संस्कृत को सुव्यवस्थित रूप दिया। संस्कृत को “देवभाषा” कहा गया और इसमें महाकाव्य, नाटक और शास्त्र रचे गए।
संस्कृत से प्राकृत भाषाओं का विकास हुआ। इनमें पाली, अर्धमागधी और शौरसेनी प्रमुख थीं। इन भाषाओं का प्रयोग साधारण जनता करती थी। भगवान बुद्ध और महावीर ने अपने उपदेश इन्हीं भाषाओं में दिए जिससे ये जल्दी लोकप्रिय हुईं।
प्राकृत से अपभ्रंश भाषाएँ विकसित हुईं। अपभ्रंश को आधुनिक भारतीय भाषाओं की जननी कहा जाता है। राजस्थानी, गुजराती और प्रारंभिक हिंदी की जड़ें अपभ्रंश में मिलती हैं।
अपभ्रंश से बोलियों का विकास हुआ जिनमें अवधी, ब्रज, मैथिली, भोजपुरी, राजस्थानी और बुंदेली प्रमुख हैं। अवधी में तुलसीदास ने रामचरितमानस, ब्रज में सूरदास ने अपने पद और मैथिली में विद्यापति ने भक्ति और प्रेम काव्य लिखा।
अंततः उन्नीसवीं शताब्दी में खड़ी बोली आधारित आधुनिक हिंदी का जन्म हुआ। भारतेन्दु हरिश्चंद्र, महावीर प्रसाद द्विवेदी और प्रेमचंद जैसे साहित्यकारों ने इसे साहित्य की भाषा बनाया। आज हिंदी केवल साहित्यिक भाषा ही नहीं, बल्कि भारत की राजभाषा और विश्व की प्रमुख भाषाओं में से एक है।
हिंदी की बोलियाँ
हिंदी भाषा की विशेषता इसकी बोलियों की विविधता है। प्रत्येक बोली ने हिंदी साहित्य को नया स्वर और दिशा दी। ब्रजभाषा में भक्ति आंदोलन की अमूल्य रचनाएँ मिलती हैं। सूरदास ने इसमें भगवान कृष्ण के जीवन का अद्भुत चित्रण किया। अवधी में तुलसीदास ने रामचरितमानस जैसी महान कृति रची, जिसने हिंदी को घर-घर तक पहुँचा दिया। मैथिली में विद्यापति के प्रेम और भक्ति गीत अत्यंत प्रसिद्ध हुए। इसके अलावा भोजपुरी, राजस्थानी, बुंदेली और मारवाड़ी बोलियों में भी लोकगीत और लोककथाओं की भरमार है।
लिपि का उद्भव
भाषा मौखिक रूप में तो बहुत पहले से थी, लेकिन जब ज्ञान और संस्कृति को सुरक्षित रखने की आवश्यकता हुई तब लिपि का निर्माण हुआ। भारत की सबसे प्राचीन लिपि सिंधु लिपि मानी जाती है जो अभी तक पूरी तरह पढ़ी नहीं जा सकी है। इसके बाद ब्राह्मी लिपि का प्रयोग हुआ। ब्राह्मी लिपि ध्वन्यात्मक और वैज्ञानिक थी। सम्राट अशोक के शिलालेख इसी लिपि में लिखे गए हैं।
उत्तर-पश्चिम भारत में खरोष्ठी लिपि का प्रयोग हुआ जो दाएँ से बाएँ लिखी जाती थी। समय के साथ ब्राह्मी से अनेक लिपियों का जन्म हुआ जैसे बंगाली, गुजराती, तमिल, तेलुगु, कन्नड़ और देवनागरी।
देवनागरी लिपि का विकास
हिंदी की वर्तमान लिपि देवनागरी है। इसका विकास ब्राह्मी से होकर गुप्त, सिद्धमात्रिका और नागरी होते हुए देवनागरी तक पहुँचा। देवनागरी की सबसे बड़ी विशेषता है कि इसमें स्वर और व्यंजन दोनों के लिए स्वतंत्र चिह्न हैं और मात्राओं का स्पष्ट प्रयोग होता है। इसमें जैसा बोला जाता है वैसा ही लिखा जाता है, इसीलिए इसे वैज्ञानिक लिपि माना जाता है।
ग्यारहवीं और बारहवीं शताब्दी तक इसका स्वरूप स्थिर हो गया और आज यह हिंदी, संस्कृत, मराठी और नेपाली जैसी प्रमुख भाषाओं की लिपि है।
भाषा और लिपि का महत्व
भाषा और लिपि का महत्व केवल संचार तक सीमित नहीं है। भाषा साहित्य को जन्म देती है और लिपि उसे स्थायित्व देती है। वेद, उपनिषद, रामायण, महाभारत, कबीर के दोहे, तुलसीदास की चौपाइयाँ – ये सब हमें आज इसलिए मिलते हैं क्योंकि वे लिपि में सुरक्षित किए गए।
हिंदी भाषा ने राष्ट्रीय एकता में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। स्वतंत्रता आंदोलन में हिंदी के नारे और गीतों ने लोगों को एकजुट किया। आज हिंदी को भारत की राजभाषा का दर्जा प्राप्त है और यह विश्व की तीसरी सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है।
आधुनिक समय में हिंदी और देवनागरी
आज हिंदी साहित्य, शिक्षा, मीडिया, फिल्मों और इंटरनेट में पूरी तरह से स्थापित है। सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफार्मों पर हिंदी का प्रयोग लगातार बढ़ रहा है। देवनागरी लिपि की सरलता और वैज्ञानिकता ने हिंदी को और अधिक सशक्त बनाया है।
निष्कर्ष
निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि भाषा और लिपि का इतिहास वास्तव में मानव सभ्यता का इतिहास है। संस्कृत से प्राकृत, अपभ्रंश और बोलियों से होते हुए हिंदी का विकास हमारे सांस्कृतिक वैभव को दर्शाता है। इसी प्रकार ब्राह्मी से देवनागरी तक लिपि का विकास भारतीय ज्ञान परंपरा का प्रमाण है। भाषा और लिपि न केवल संचार का साधन हैं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक धरोहर हैं। इन्हें सुरक्षित और संरक्षित रखना हमारी जिम्मेदारी है।

